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Thursday, January 14, 2010

एक फूल

एक फूल खिला मधुवन में, बसंत की रुत में.
कोमल सा कमसिन सा, बढने लगा सावन में.

रुत बदली और पतझड़ आया, फूल नें मधुवन को उजड़ा पाया.
बिन साथ बिन जीवन पाया.

Saturday, January 17, 2009

कविता

कविता के माध्यम से भावो की व्यक्ती हो जाती है
जो बात जुब्बान नही कह पाती कलम कह जाती है.

कैसे  बाँध सकतें हैं उन्हें शब्दों मैं जो हर पल बदल जाते हैं,
एक कविता बाँधती नही, खोल देती हैं द्वार कल्पना के,
उन कल्पनाओ के सागर में भावनाओ को कई लहरें मिल जाती हैं
जीवन से भरी लहरें हीं समझ पातीं हैं इस उलझन को.

तब यह भाव कविता के माध्यम से सागर को समझने लगते हैं।
ये कविता को एक नया जीवन दे देते हैं।

Tuesday, July 1, 2008

वोह साथी और वोह मंजील

- अंजली

यूं चले थे घर से एक मंजील की तलाश में 
एक साथी मिला दो साथी मिले एक कारवा बना |

फिर वो मज़ील मिली
और दूर आस्मां के एक छूर पे ले जाने लगी |

वोह साथी मेरे और वोह कारवा
जब बढ़ रहे थे समंदर को, तब मंजील मेरी बढ़ने लगी आसमां को|

कई सवाल उठने लगे झ्हम मैं ,
कयों कतरो मैं मिलती हैं ज़िन्दगी|